दिल्ली था जिसका नाम 

​​पुस्तक में दिल्ली के कई-कई बार बसने उजड़ने की दास्तां बड़े रोचक अंदाज़ में बयां की गई है. ऐसा लगता है जैसे कोई कहानी सुना रहा हो. ख़ैर, पांडवों के इंद्रप्रस्थ से लेकर आधुनिक काल में नई दिल्ली के नाम से भारत की राजधानी के रूप में मौजूदा पहचान पाने तक यमुना में बहुत पानी बहा है. जिस-जिसने भी यहां से भारत का संचालन किया उसने डेढ़ ईंटों की अपनी-अपनी दिल्ली बसाने का प्रयास किया था. यह वैभवशाली शहर कुछ ऐसे शासकों से भी मिल चुका है, जो अपना राजकाज यहां से समेटकर कहीं और ले गए थे, जैसे-देवगिरी जानेवाला तुग़लक़ हो या आगरा को राजधानी बनानेवाले शहंशाह अकबर. पर दिल्ली में कुछ तो ऐसा है, जो शासकों को अपनी ओर खींचता है. आगरा को ताजमहल जैसी मशहूर पहचान देने के बाद अकबर के पोते शाहजहां का मन वहां से भर गया. उन्होंने शाहजहानाबाद नाम से दिल्ली को दोबारा बसाया और मुग़ल मयूर सिंहासन यहां स्थापित किया. अंग्रेज़ भी तो कलकत्ता से समंदर का किनारा छोड़कर यमुना तट पर आए थे.

- अमरेन्द्र यादव 


Genre: Gender & Sexuality Studies | Psychology | Sociology
Price: Rs.995
ISBN: 9789351508908


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